हिंदू धर्म से संबंधित सुधारक संस्थाएँ - ब्रह्म समाज Notes For Prelims Exam and Oneday Exam | ब्रह्म समाज Notes

Socio Religious Movement in British india

हिंदू धर्म से संबंधित सुधारक संस्थाएँ 

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ब्रह्म समाज 

बंगाल में प्रारंभ हुए समाज सुधार आंदोलनों का नेतृत्व राजा राममोहन राय ने किया । इन्हें भारत में नवजागरण का अग्रदूत , सुधार आंदोलनों का प्रवर्तक, आधुनिक भारत का पिता, नवप्रभात का तारा एवं भारतीय पत्रकारिता का जनक कहा जाता है । राजा राममोहन राय प्राच्य और पाश्चात्य चिंतन के मिले - जुले रूप के प्रतिनिधि थे । 

➤ 1828 में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा की स्थापना कलकत्ता में की , जिसे बाद में ' ब्रह्म समाज ' कहा गया । ब्रह्म समाज के मुख्य उद्देश्य ' हिंदू धर्म ' में सुधार लाना , सभी धर्मों की अच्छाइयों को अपनाना , मूर्ति पूजा का विरोध , एक ब्रह्म की पूजा का उपदेश देना , पुरोहितवाद का विरोध करना आदि थे । उन्होंने एकेश्वरवाद का समर्थन कर धर्मों की आपसी एकता पर जोर दिया । ब्रह्म समाज के सिद्धांतों और दृष्टिकोण के मुख्य आधार थे- मानव - विवेक ( तर्क - शक्ति ) , वेद व उपनिषद् | 

➤ राजा राममोहन राय धार्मिक , दार्शनिक व सामाजिक दृष्टिकोण में इस्लाम के एकेश्वरवाद , सूफीमत के रहस्यवाद , ईसाई धर्म की आचार शास्त्रीय नीतिपरक शिक्षा और पश्चिम के आधुनिक देशों के उदारवादी - बुद्धिवादी सिद्धांतों के समर्थक थे । 

➤ सामाजिक क्षेत्र में राजा राममोहन राय हिंदू समाज की कुरीतियों सती प्रथा , बहुपत्नी प्रथा , वेश्यागमन , जातिवाद , बाल विवाह आदि के घोर विरोधी थे । विधवा पुनर्विवाह का इन्होंने समर्थन किया । 

➤ धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने मूर्ति पूजा की आलोचना करते हुए, अपने पक्ष को वेदोक्तियों के माध्यम से सिद्ध करने का प्रयास किया । इन्होंने कर्मकांड का विरोध किया तथा धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या के लिये पुरोहित वर्ग को अस्वीकार किया । उन्होंने यह भी कहा कि अगर धर्म सामाजिक सुधार की अनुमति नहीं देते तो उसे बदल दिया जाना चाहिये । 

➤ एकेश्वरवादी मत के प्रचार हेतु उन्होंने 1815 में ' आत्मीय सभा ' का भी गठन किया । 1822 फारसी भाषा में उन्होंने मिरात - उल अखबार ( मिरातुल अखबार ) का प्रकाशन किया । कलकत्ता यूनिटेरियन कमेटी का गठन 1823 में राजा राममोहन राय , द्वारकानाथ टैगोर और विलियम एडम द्वारा किया गया ।

➤ 1821 में बांग्ला भाषा में ' संवाद कौमुदी ' का भी प्रकाशन किया । सती प्रथा के विरोध के लिये इन्होंने अपनी इस पत्रिका का उपयोग किया । 

➤ राजा राममोहन राय ने डच घड़ीसाज डेविड हेयर के सहयोग से 1817 में कलकत्ता में ' हिंदू कॉलेज ' की स्थापना की । 1825 में . उन्होंने कलकत्ता में ' वेदांत कॉलेज ' की स्थापना की । 

नोट : उल्लेखनीय है कि राजा राममोहन राय ने 1826 के जूरी अधिनियम , जो कि 1827 में प्रभाव में आया था , का घोर विरोध किया था । इस कानून के अंतर्गत , न्यायालयों में धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ । वस्तुतः इस अधिनियम में यूरोपीय या भारतीय ईसाईयों की न्यायिक सुनवाई का अधिकार हिंदू या मुसलमान न्यायाधीशों को नहीं दिया गया था , जबकि हिंदू या मुसलमानों के मामलों की सुनवाई कोई यूरोपीय अथवा भारतीय ईसाई न्यायाधीश कर सकता था ।

➤ राजा राममोहन राय ने फारसी भाषा में ' तोहफत - उल - मुवाहहीदीन ' ( एकेश्वरवादियों को उपहार ) का प्रकाशन किया , जिसमें उन्होंने एकेश्वरवाद के पक्ष में विवेकपूर्ण तर्क दिये । 

➤ मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को ' राजा ' की उपाधि प्रदान की थी । 

➤ राजा राममोहन राय की मृत्यु 1833 में ब्रिटेन के ब्रिस्टल में हुई । 

➤ राजा राममोहन राय के पश्चात् देवेंद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज को कुशल नेतृत्व प्रदान किया । 1839 में उन्होंने ' तत्त्वबोधिनी सभा ' की स्थापना की । तत्त्वबोधिनी सभा ने ' तत्त्वबोधिनी पत्रिका ' के माध्यम से भारत के अतीत के सुव्यवस्थित अध्ययन को प्रोत्साहित किया । 

➤ ब्रह्म समाज की शाखाएँ संयुक्त प्रांत , पंजाब तथा मद्रास में खोली गईं । ब्रह्म समाज के विचारों को लेकर 1865 में केशवचंद्र सेन व देवेंद्रनाथ टैगोर के बीच विवाद हुआ , जिसके कारण केशवचंद्र सेन मूल ब्रह्म समाज से अलग हो गए और 1866 में औपचारिक रूप से ' भारतीय ब्रह्म समाज ' की स्थापना की तथा पूर्व स्थापित ब्रह्म समाज को ' आदि ब्रह्म समाज ' कहा गया । 

➤ 1868 में केशव चंद्र सेन ने ' टेबरेनेकल ऑफ न्यू डिस्पेंसेशन ' नामक संघ की स्थापना की । 1870 में उन्होंने हिंदू पुनरुद्धार के प्रवक्ता के रूप में इंग्लैंड की यात्रा की । वहाँ से लौटने के उपरांत उन्होंने ' इंडियन रिफॉर्म एसोसिएशन ' नामक संस्था का गठन किया ।

➤ आचार्य सेन ने स्त्रियों के उद्धार , स्त्री शिक्षा आदि सामाजिक कार्यों के लिये योगदान दिया । 

➤ 1872 में आचार्य केशव चंद्र सेन ने सरकार को ब्रह्म विवाह अधिनियम को कानूनी दर्जा दिलवाने हेतु तैयार कर लिया । 1872 में ब्रह्म विवाह अधिनियम पास किया गया , जिसमें 14 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं तथा 18 वर्ष से कम आयु के बालकों का विवाह वर्जित कर दिया गया । 

➤ ब्रह्म समाज का द्वितीय विभाजन 1878 में केशवचंद्र सेन के कारण हुआ । आचार्य केशव चंद्र सेन ने ब्रह्म विवाह अधिनियम -1872 का उल्लंघन करते हुए अपनी अल्पायु पुत्री का विवाह कूचबिहार के राजा से कर दिया , जो ब्रह्म समाज के द्वितीय विघटन का कारण बना । 

1878 में केशवचंद्र सेन के नेतृत्व वाले ब्रह्म समाज ( भारतीय ब्रह्म समाज ) से अलग हुए गुट ( शिवनाथ शास्त्री , आनंद मोहन बोस , उमेशचंद्र दत्त , शिवचंद्र देव और द्वारकानाथ गांगुली ) ने ' साधारण ब्रह्म समाज ' की स्थापना की , जिनका उद्देश्य था- जाति प्रथा , मूर्ति पूजा का विरोध , नारी मुक्ति आदि का समर्थन करना ।

हिंदू धर्म से संबंधित सुधारक संस्थाएँ  - ब्रह्म समाज

इस आर्टिकल मे हमने हिंदू धर्म से संबंधित सुधारक संस्थाएँ  - ब्रह्म समाज  से संबंधित महवपूर्ण GK के बारे मे जाना है । हम आशा करते है की आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया होगा और यह GK Notes आपके Exam के लिए महवपूर्ण हो । 

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