भारत मे पुर्तगालियों का आगमन Notes For UPSC Prelims Exam

 पुर्तगालियों का आगमन 

 भारत में यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों के आगमन का क्रम है -  पुर्तगाली → डच → अंग्रेज → डेन → फ्रांसीसी । 

भारत मे पुर्तगालियों का आगमन,bharat me purtagaaliyon ka aagaman,Arrival of Portuguese in India


➤ सर्वप्रथम मई 1498 में ' वास्कोडिगामा ' नामक पुर्तगाली नाविक उत्तमाशा अंतरीप ( केप ऑफ गुड होप ) का चक्कर काटते हुए एक गुजराती व्यापारी अब्दुल मजीद की सहायता से भारत के ' कालीकट ' बंदरगाह पर पहुँचा । जहाँ ' कालीकट ' के हिंदू शासक ( उपाधि - जमोरिन ) ने उसका स्वागत किया । 

➤ वास्कोडिगामा ने कालीकट के राजा से व्यापार का अधिकार प्राप्त किया . जिसका अरबी व्यापारियों ने विरोध किया । विरोध का कारण आर्थिक हित था । अंततः वास्कोडिगामा जिस मसालों को लेकर वापस स्वदेश लौटा , वह पूरी यात्रा की कीमत के 60 गुना दामों पर बिका । परिणामतः इस लाभकारी घटना ने अन्य पुर्तगाली व्यापारियों को भारत आने के लिये आकर्षित किया । 

➤ ध्यातव्य है कि पूर्व के साथ व्यापार हेतु ' इस्तादो - द- इंडिया ' नामक कंपनी की स्थापना की गई । वास्तव में पोप अलैक्जेंडर- VI द्वारा 1453 में ही पूर्वी सामुद्रिक व्यापार हेतु आज्ञापत्र दे दिया गया था ।

➤ 1500 में ' पेड्रो अल्वरेज कैब्राल ' के नेतृत्व में दो जहाज़ी बेड़े भारत आए । 

➤ वास्कोडिगामा अक्तूबर 1502 में दूसरी बार भारत आया । इसके बाद पुर्तगालियों का भारत में निरंतर आगमन प्रारंभ हुआ । पुर्तगालियों की पहली फैक्ट्री कालीकट में स्थापित हुई , जिसे जमोरिन द्वारा बाद में बंद करवा दिया गया । 

➤ 1503 में काली मिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने कोचीन के पास अपनी पहली व्यापारिक कोठी बनाई । इसके बाद कन्नूर ( 1505 ) में पुर्तगालियों ने अपनी दूसरी फैक्ट्री बनाई । 1503 ई . में अल्बुकर्क ने कोचीन में दुर्ग ( फोर्ट ) बनवाया था । 

➤ भारत में सबसे पहले आने एवं सबसे बाद में जाने वाली यूरोपीय औपनिवेशिक शक्ति पुर्तगाली थे । 1961 में गोवा की स्वतंत्रता के समय मैनुएल एंटोनियो वस्सालो ए सिल्वा गोवा का गवर्नर था ।

पुर्तगाली वायसराय 

फ्राँसिस्को - डी - अल्मीडा ' ( 1505-1509 ) 

➤  फ्राँसिस्को - डी - अल्मीडा ' ( 1505-1509 ) भारत में पहला पुर्तगाली वायसराय बनकर आया । उसने भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिये मज़बूत सामुद्रिक नीति का संचालन किया , जिसे ' ब्लू वाटर पॉलिसी ' अथवा ' शांत जल की नीति ' कहा जाता है । 

●  1508 में वह ' चौल के युद्ध ' में गुजरात के शासक से संभवतः परास्त हुआ , किंतु 1509 में ' दीव के युद्ध ' में उसने महमूद बेगड़ा , मिस्र तथा तुर्की शासकों के समुद्री बेड़े को पराजित किया । 

अल्फांसो - डी- अल्बुकर्क ' ( 1509-1515 ) 

➤  अल्फांसो - डी- अल्बुकर्क ' ( 1509-1515 ) दूसरा वायसराय बनकर आया । उसने अल्मीडा की ' ब्लू वाटर पॉलिसी ' को बंद करवाया । 1510 में उसने बीजापुर के शासक युसूफ आदिलशाह से गोवा छीन लिया , यहीं से पुर्तगाली साम्राज्य की नींव पड़ी । साथ ही गोवा की विजय ने दक्षिण - पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली नौसैनिक प्रभुत्व की मुहर लगा दी । अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है । 

● विजयनगर शासक , कृष्णदेव राय ने पुर्तगालियों को भटकल में दुर्ग बनाने की इज़ाज़त दी । अल्बुकर्क ने पुर्तगालियों को भारतीय स्त्रियों से विवाह करने के लिये प्रोत्साहित किया । 

● अल्बुकर्क ने 1511 में मलक्का द्वीप तथा 1515 में हॉरमुज पर अधिकार किया । 

● अल्बुकर्क ने गोवा में सती प्रथा को प्रतिबंधित किया । 

नीनो - डी - कुन्हा ' ( 1529-1538 ) 

➤  नीनो - डी - कुन्हा ' ( 1529-1538 ) अल्बुकर्क के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण वायसराय था । 1530 में कोचीन की जगह गोवा को पुर्तगालियों की राजधानी बनाया और सेंट टोमे तथा हुगली में पुर्तगाली बस्तियाँ बसाई । 

• नीनो - डी - कुन्हा ने गुजरात के शासक बहादुरशाह से मुलाकात के दौरान जहाज़ पर उसकी हत्या कर बसीन ( 1534 ) व दीव ( 1535 ) पर आधिपत्य स्थापित कर लिया । 

➤  धीरे - धीरे पुर्तगालियों ने हिंद महासागर में होने वाले व्यापार पर एकाधिकार कर लिया । ' कार्टेज आर्मेडा पद्धति ' लागू की जो एक प्रकार का लाइसेंस था । यदि कोई देश या व्यक्ति अपने जहाज़ को किसी एशियाई देश में भेजना चाहता था तो उसे कार्टेज लेना आवश्यक था जिसके लिये निर्धारित शुल्क देना होता था । उल्लेखनीय है कि अकबर ने भी समुद्री व्यापार हेतु कार्टेज स्वीकार कर लिया था । 

➤  पुर्तगालियों ने सोकोत्रा द्वीप , फारस की खाड़ी , हॉरमुज तथा हिंद महासागर में अपनी चौकियाँ स्थापित की । भारत का जापान के साथ व्यापार का श्रेय भी पुर्तगालियों को जाता है । 

➤  पुर्तगालियों के आगमन से भारत में तंबाकू , लाल मिर्च , आलू , टमाटर की खेती , जहाज़ निर्माण तथा प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई । स्थापत्य कला में गोथिक कला का विकास हुआ । भारत में पुर्तगाली साम्राज्य के पतन के कारणों में धार्मिक असहिष्णुता , भारतीय व्यापारियों संग लूटपाट , भारतीय महिलाओं संग वैवाहिक नीति आदि का मराठों व मुगलों द्वारा विरोध किया जाना था । 1632 में शाहजहाँ ने पुर्तगालियों को हुगली से भगाया । वस्तुतः पुर्तगालियों द्वारा हुगली को बंगाल की खाड़ी में समुद्री लूटपाट के अड्डे के रूप में प्रयोग में लाया जाता था । 

➤  1661 में पुर्तगाली राजकुमारी केथरीन का विवाह ब्रिटिश राजकुमार चार्ल्स द्वितीय से हुआ और चार्ल्स II को भारत में बंबई क्षेत्र दहेज के तौर पर प्राप्त हुआ । बाद में 1668 ई . में बंबई को 10 पाउण्ड वार्षिक किराये पर ब्रिटिश कंपनी को दे दिया गया ; साथ ही तत्कालीन स्पेन में पुर्तगाल के शामिल हो जाने पर स्पेन सरकार का कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ गया जिससे पुर्तगालियों की उपनिवेश संबंधी गतिविधियाँ पश्चिम की तरफ उन्मुख हो गईं ।


भारत मे पुर्तगालियों का आगमन

इस आर्टिकल मे हमने भारत मे पुर्तगालियों का आगमन से संबंधित महवपूर्ण GK के बारे मे जाना है । हम आशा करते है की आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया होगा और यह GK Notes आपके Exam के लिए महवपूर्ण हो । 

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